000 04072nam a22001457a 4500
999 _c1669
_d1669
020 _a9788180312717
082 _a891
_bSHU
100 _aShukl, Ramchandra
245 _aBhramargeet Saar
250 _a-
260 _aNew- Delhi
_bLokbharti
_c2012
300 _a182p.
500 _a'भ्रमरगीत' सूरसागर के भीतर का एक सार रत्न है। समग्र सूरसागर का कोई अच्छा संस्करण न होने के कारण 'सूर' के हृदय से निकली हुई अपूर्व रसधारा के भीतर प्रवेश करने का श्रम कम ही लोग उठाते हैं। मैंने सन् १९२० में भ्रमरगीत के अच्छे पद चुनकर इकट्ठे किए और उन्हें प्रकाशित करने का आयोजन किया। पर कई कारणों से उस समय पुस्तक प्रकाशित न हो सकी। छपे फार्म कई बरसों तक पड़े रहे। इतने दिनों पीछे आज 'भ्रमरगीत-सार' सहृदय-समाज के सामने रखा जाता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'सूरसागर' के जितने संस्करण उपलब्ध हैं उनमें से एक भी शुद्ध और ठिकाने से छपा हुआ नहीं है। सूर के पदों का ठीक पाठ मिलना एक मुश्किल बात हो रही है। 'वेंकटेश्वर प्रेस' का संस्करण अच्छा समझा जाता है पर उसमें पाठ की गड़बड़ी और भी अधिक है। उदाहरण के लिए दो पदों के टुकड़े दिए जाते हैं–– (क) अति मलीन बृषभानु-कुमारी। अधोमुख रहति, उर्ध नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी॥ (ख) मृग ज्यों सहत सहज सर दारुन, सन्मुख तें न टरै। समुझि न परै कौन सचु पावत, जीवत जाय मरै॥ [ ३ ]ये इस प्रकार छपे हैं–– (क) अलि मलीन बृषभानुकुमारी। अधोमुख रहत ऊरध नहिं चितवत ज्यों गथ हारे थकित जुथअरी॥ (ख) मग ज्यों सहत सहज सरदारन सनमुख तें न टरै। समुझि न परै कवन सच पावत जीवत जाइ मरै॥ इस संग्रह में भ्रमरगीत के चुने हुए पद रखे गए हैं। पाठ, जहाँ तक हो सका है, शुद्ध किया गया है। कठिन शब्दों और वाक्यों के अर्थ फुटनोट में दे दिए गए हैं। सूरदास जी पर एक आलोचनात्मक निबंध भी लगा दिया गया है, जिसमें उनकी विशेषताओं के अन्वेषण का कुछ प्रयत्न है। गुरुधाम, काशी श्रीपंचमी, १९८२ {\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}}{\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}} रामचन्द्र शुक्ल
942 _cBK