Bhramargeet Saar
Material type:
TextPublication details: New- Delhi Lokbharti 2012Edition: -Description: 182pISBN: - 9788180312717
- 891 SHU
| Item type | Current library | Collection | Call number | Status | Notes | Date due | Barcode | |
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Degree College Books
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Thakur Ramnarayan College of Arts and Commerce Library | Hindi Books | 891 SHU (Browse shelf(Opens below)) | Available | Order By Ms. Binita Jha | 2418 |
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| 891 SAT Nibandh- Nilay | 891 SHA Kabeer Granthavali (Sateek) | 891 SHU Hindi Sahitya Ka Itihasa | 891 SHU Bhramargeet Saar | 891 SHU Hindi Sahitya Ka Itihaas | 891 YAS Divya | 891.43 SIN Kavya Sarita |
'भ्रमरगीत' सूरसागर के भीतर का एक सार रत्न है। समग्र सूरसागर का कोई अच्छा संस्करण न होने के कारण 'सूर' के हृदय से निकली हुई अपूर्व रसधारा के भीतर प्रवेश करने का श्रम कम ही लोग उठाते हैं। मैंने सन् १९२० में भ्रमरगीत के अच्छे पद चुनकर इकट्ठे किए और उन्हें प्रकाशित करने का आयोजन किया। पर कई कारणों से उस समय पुस्तक प्रकाशित न हो सकी। छपे फार्म कई बरसों तक पड़े रहे। इतने दिनों पीछे आज 'भ्रमरगीत-सार' सहृदय-समाज के सामने रखा जाता है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि 'सूरसागर' के जितने संस्करण उपलब्ध हैं उनमें से एक भी शुद्ध और ठिकाने से छपा हुआ नहीं है। सूर के पदों का ठीक पाठ मिलना एक मुश्किल बात हो रही है। 'वेंकटेश्वर प्रेस' का संस्करण अच्छा समझा जाता है पर उसमें पाठ की गड़बड़ी और भी अधिक है। उदाहरण के लिए दो पदों के टुकड़े दिए जाते हैं––
(क) अति मलीन बृषभानु-कुमारी।
अधोमुख रहति, उर्ध नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी॥
(ख) मृग ज्यों सहत सहज सर दारुन, सन्मुख तें न टरै।
समुझि न परै कौन सचु पावत, जीवत जाय मरै॥
[ ३ ]ये इस प्रकार छपे हैं––
(क) अलि मलीन बृषभानुकुमारी।
अधोमुख रहत ऊरध नहिं चितवत ज्यों गथ हारे थकित जुथअरी॥
(ख) मग ज्यों सहत सहज सरदारन सनमुख तें न टरै।
समुझि न परै कवन सच पावत जीवत जाइ मरै॥
इस संग्रह में भ्रमरगीत के चुने हुए पद रखे गए हैं। पाठ, जहाँ तक हो सका है, शुद्ध किया गया है। कठिन शब्दों और वाक्यों के अर्थ फुटनोट में दे दिए गए हैं। सूरदास जी पर एक आलोचनात्मक निबंध भी लगा दिया गया है, जिसमें उनकी विशेषताओं के अन्वेषण का कुछ प्रयत्न है।
गुरुधाम, काशी
श्रीपंचमी, १९८२ {\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}}{\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}}
रामचन्द्र शुक्ल
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