Bhramargeet Saar (Record no. 1669)
[ view plain ]
| 000 -LEADER | |
|---|---|
| fixed length control field | 04072nam a22001457a 4500 |
| 020 ## - INTERNATIONAL STANDARD BOOK NUMBER | |
| ISBN | 9788180312717 |
| 082 ## - DEWEY DECIMAL CLASSIFICATION NUMBER | |
| Classification number | 891 |
| Item number | SHU |
| 100 ## - MAIN ENTRY--AUTHOR NAME | |
| Personal name | Shukl, Ramchandra |
| 245 ## - TITLE STATEMENT | |
| Title | Bhramargeet Saar |
| 250 ## - EDITION STATEMENT | |
| Edition statement | - |
| 260 ## - PUBLICATION, DISTRIBUTION, ETC. (IMPRINT) | |
| Place of publication | New- Delhi |
| Name of publisher | Lokbharti |
| Year of publication | 2012 |
| 300 ## - PHYSICAL DESCRIPTION | |
| Number of Pages | 182p. |
| 500 ## - GENERAL NOTE | |
| General note | 'भ्रमरगीत' सूरसागर के भीतर का एक सार रत्न है। समग्र सूरसागर का कोई अच्छा संस्करण न होने के कारण 'सूर' के हृदय से निकली हुई अपूर्व रसधारा के भीतर प्रवेश करने का श्रम कम ही लोग उठाते हैं। मैंने सन् १९२० में भ्रमरगीत के अच्छे पद चुनकर इकट्ठे किए और उन्हें प्रकाशित करने का आयोजन किया। पर कई कारणों से उस समय पुस्तक प्रकाशित न हो सकी। छपे फार्म कई बरसों तक पड़े रहे। इतने दिनों पीछे आज 'भ्रमरगीत-सार' सहृदय-समाज के सामने रखा जाता है।<br/><br/>कहने की आवश्यकता नहीं कि 'सूरसागर' के जितने संस्करण उपलब्ध हैं उनमें से एक भी शुद्ध और ठिकाने से छपा हुआ नहीं है। सूर के पदों का ठीक पाठ मिलना एक मुश्किल बात हो रही है। 'वेंकटेश्वर प्रेस' का संस्करण अच्छा समझा जाता है पर उसमें पाठ की गड़बड़ी और भी अधिक है। उदाहरण के लिए दो पदों के टुकड़े दिए जाते हैं––<br/><br/>(क) अति मलीन बृषभानु-कुमारी।<br/>अधोमुख रहति, उर्ध नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी॥<br/>(ख) मृग ज्यों सहत सहज सर दारुन, सन्मुख तें न टरै।<br/>समुझि न परै कौन सचु पावत, जीवत जाय मरै॥<br/><br/>[ ३ ]ये इस प्रकार छपे हैं––<br/>(क) अलि मलीन बृषभानुकुमारी।<br/>अधोमुख रहत ऊरध नहिं चितवत ज्यों गथ हारे थकित जुथअरी॥<br/>(ख) मग ज्यों सहत सहज सरदारन सनमुख तें न टरै।<br/>समुझि न परै कवन सच पावत जीवत जाइ मरै॥<br/><br/>इस संग्रह में भ्रमरगीत के चुने हुए पद रखे गए हैं। पाठ, जहाँ तक हो सका है, शुद्ध किया गया है। कठिन शब्दों और वाक्यों के अर्थ फुटनोट में दे दिए गए हैं। सूरदास जी पर एक आलोचनात्मक निबंध भी लगा दिया गया है, जिसमें उनकी विशेषताओं के अन्वेषण का कुछ प्रयत्न है।<br/><br/>गुरुधाम, काशी<br/>श्रीपंचमी, १९८२ {\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}}{\displaystyle \scriptstyle {\left.{\begin{matrix}\ \\\ \end{matrix}}\right\}\,}} <br/>रामचन्द्र शुक्ल<br/><br/> |
| 942 ## - ADDED ENTRY ELEMENTS (KOHA) | |
| Koha item type | Degree College Books |
| Withdrawn status | Lost status | Not for loan | Collection code | Home library | Current library | Shelving location | Date acquired | Source of acquisition | Cost, normal purchase price | Inventory number | Full call number | Accession Number | Cost, replacement price | Non-public note | Koha item type | Public note |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Hindi Books | Thakur Ramnarayan College of Arts and Commerce | Thakur Ramnarayan College of Arts and Commerce | Library | 10/29/2022 | Paridrishya Prakashan | 58.50 | 14352 | 891 SHU | 2418 | 65.00 | 10% | Degree College Books | Order By Ms. Binita Jha |